प्रेम का एहसास

प्रेम की अनुभूति वास्तव में अनुपम है। यह जब किसी को होती है, तब सिर्फ वह ही उसे महसूस कर सकता है। अन्य के लिए वह मात्र विचार ही है।

विरह का दर्द सिर्फ वही मनुष्य समझ सकता है जो की पहले प्रेम को समझता है। प्रेम में आसक्ति नहीं अपितु भक्ति की आवश्यकता है। प्रेम के कई प्रकार है, जैसे की मैं मानता हूं कि प्रेम एक साधना है जिसे साधकर कोई भी मनुष्य अपने को इस भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ पल सुकून के साथ बिता सकता है।

प्रेम का अर्थ सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका के प्रेम से नही बल्कि यह तो एक साधक की अपने साधन की साधने की प्रक्रिया है। प्रेम में भावनाओं का बड़ा ही महत्व है क्योंकि प्रेम होते ही किसी भी व्यक्ति के मन में कुछ नई ही भावनाएं उमड़ने लगती है जो की इसी प्रक्रिया का एक अंग है।

प्रेम में वासना का कोई स्थान नही है, क्योंकि वासना अर्थात किसी भी विषय के प्रति आसक्ति जबकि मैंने पहले कहा कि प्रेम आसक्ति नही बल्कि भक्ति का नाम है। वासना मनुष्य के पतन का कारण है। जो भी मनुष्य इस अर्थ को समझ जाता है वह इस भवसागर रूपी संसार से परे हो जाता है।

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